भारतीय विज्ञान का इतिहास: ‘नीधम’ ग्रैंड क्वेश्चन
भारतीय विज्ञान का इतिहास: ‘नीधम’ ग्रैंड क्वेश्चन
लेखक: सतीश कालडा
‘नीधम’ ग्रैंड क्वेश्चन
बायोकेमिस्ट से इतिहासकार बने ब्रिटिश बायोकेमिस्ट जोसेफ नीधम (1900-1995) ने 1954 में प्रकाशित 24 खण्डों में लिखी 'साइंस एंड सिविलाइज़ेशन इन चाइना' का समापन इस सवाल से किया कि:
"यह देश सदियों तक तकनीकी और विज्ञान का अगुआ बने रहने के बावजूद आधुनिक युग में पश्चिमी देशों से पिछड़ क्यों गया जबकि इसी देश में ही खोजे गए बारूद, मैग्नेटिक कम्पास, कागज़ और प्रिंटिंग की मदद यूरोप के लिए अंधे मध्य युग से आधुनिक युग तक की यात्रा का माध्यम बने?"
जवाब में उन्होंने इसे वहां लोगों में प्रचलित वैज्ञानिक विकास से मेल ना खाने वाले 'कन्फ्यूशियस दर्शन' से जोड़ा।
इस सवाल को आगे बढाते हुए मारकंडे काटजू ने 11 जून, 2014 के 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में प्रकाशित लेख में दशमलव सिस्टम, आर्यभट, सुश्रुत और सिंधु घाटी सभ्यता के दौर में विकसित गुजरात की लोथाल बंदरगाह के निर्माण के हवाले से लिखा कि:
"जब ग्रीस और रोम के अलावा दूसरे यूरोप वासी जंगलों में रह रहे थे तब भारत देश में विज्ञान और तकनीकी के इस्तेमाल से महान सभ्यताएँ विकसित हुईं, लेकिन आधुनिक युग में यहाँ तो इस क्षेत्र में विकास रुक गया जबकि यूरोप में असंख्य वैज्ञानिक जन्म लेते रहे।"
इस सवाल के जवाब में विज्ञान और तकनीकी के इस्तेमाल से समाज की समस्याओं का हल भी सिमटा है और अपनी प्रेजेंटेशन में भी यही सवाल आप के सामने रख रहा हूँ।
इतिहास अध्ययन के टूल्स
- प्रीहिस्ट्री: पाषाण युग के इतिहास को जिसका अध्ययन आर्कियोलोजिकल टूल्स से करते हैं।
- प्रोटोहिस्ट्री: स्क्रिप्ट विकसित होने से पहले के युग का इतिहास जिसका अध्ययन प्राचीन मौखिक भाषाओं में उपलब्ध जानकारी के आधार पर करते हैं।
- हिस्ट्री: स्क्रिप्ट विकसित हो जाने के बाद का इतिहास जिसका अध्ययन प्राचीन दस्तावेजों में दर्ज जानकारी के आधार पर करते हैं।
प्रीहिस्ट्री की सटीक समझ के लिए पदार्थ, एटम्स और रेडियोएक्टिविटी की समझ, रेडियोमैट्रिक डेटिंग और रेडियोकार्बन डेटिंग सरीखे सशक्त टूल्स उपलब्ध हो जाने के बाद हिस्टोरियंस के हाथ मज़बूत हुए हैं। जीनोमिक्स और डीएनए एनालिसिस के टूल्स से मानव की प्रोटोहिस्ट्री व ह्यूमन माइग्रेशन का अध्ययन सहज हुआ है। इतिहास की समझ से हमें निरंतर विकास की ओर अग्रसर मानव यात्रा से उपजी चुनौतियों और संभावनाओं से रूबरू होने में मदद मिल रही है और हम मौजूदा चुनौतियों का अंदाज़ा भी लगा पा सक रहे हैं।
रेडियोकार्बन डेटिंग
- कार्बन का एटॉमिक मास 12 है और इसे सी12 (C12) कहते हैं।
- कार्बन के एक आइसोटोप का एटॉमिक मास 14 है और इसे सी14 (C14) कहते हैं। यह रेडियोकार्बन है और इससे रेडियोकार्बन डेटिंग, जिसे सी14 डेटिंग भी कहते हैं, की जाती है।
- वायुमंडल में मौजूद कार्बनडाइऑक्साइड में कार्बन के दोनों आइसोटोपस निश्चित अनुपात में होते हैं और सभी प्रकार के जीवों में भी यही अनुपात कायम रहता है।
- पौधे फ़ोटोसिंथेसिस प्रक्रिया से कार्बनडाइऑक्साइड के कार्बन हिस्से को जैविक पदार्थ में संजो लेते हैं और ऑक्सीजन वायुमंडल में प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार रेडियोकार्बन जैविक पदार्थ फ़ूड चेन के माध्यम से प्राणी जगत का हिस्सा भी बन जाता है।
- जीवित स्थिति में वायुमंडल और जैव पदार्थ में मौजूद सी12:सी14 का अनुपात समान रहता है लेकिन मृत्यु के बाद जीवों में मौजूद कार्बन का पर्यावरण से संपर्क समाप्त हो जाता है और रेडियोएक्टिव डिके की वजह से उनमें मौजूद सी14 की मात्रा घटती चली जाती है और सी12:सी14 अनुपात बदलता चला जाता है।
- सी12:सी14 अनुपात के अध्ययन से वैज्ञानिक फोसिल लकड़ी और हड्डी आदि की आयु का आकलन करते हैं।
- सी14 की हाफलाइफ 5,730 साल है।
आर्कियोजेनेटिक्स
- यह मॉलिक्यूलर जेनेटिक मेथड्स से प्राचीन डीएनए के अध्ययन का विज्ञान है।
- फॉसिल सैंपलस जैसे, हड्डियाँ, बीज आदि से प्राचीन डीएनए एक्सट्रेक्ट कर उसका एनालिसिस किया जाता है।
- इससे प्राचीन पापुलेशन की माइग्रेशन, डोमेस्टिकेशन क्रम और एवोल्यूशन को समझना संभव हो पाया है।
नोट: अखिल भारतीय जनविज्ञान नेटवर्क के तत्वाधान में चांदिता मुखर्जी के टीवी सीरियल 'भारत की छाप' पर आधारित 'क्रॉनिकल्स ऑफ़ द सेंचुरीज़' नाम से वर्ष 2024 में तैयार किए गए कैलेंडर में दर्ज जानकारी के आधार पर भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के योगदान की झलक नीचे दी गई है।
भारतीय इतिहास के विभिन्न युगों में विज्ञान और तकनीकी विकास
1. प्रीहिस्ट्री दौर - पाषाण युग (3500 ईसा पूर्व तक)
- इस युग की जानकारी बुर्जाहोम, मध्य प्रदेश में भीमकेतका गुफ़ा और बाल में हुए अध्ययनों से प्राप्त हुई है।
- भीमकेतका गुफ़ा की दीवारों पर चित्रित मुरल पेंटिंग्स में भाले और तीर-कमान जैसे शिकार करने वाले प्राचीन हथियार दर्शाए गए हैं।
- बीज रेपलीकेशन की खोज ने कृषि को जन्म दिया; महिलाओं की इस खोज को सबसे महत्वपूर्ण खोज माना जाता है जिसने मानव को लाचार परजीवी स्थिति से मुक्ति दिलाई।
- श्रम के इस्तेमाल से सरप्लस का निर्माण किया जाने लगा और जीवन में ठहराव आने लगा। बुर्जाहोम में पत्थर के उपकरण और सरप्लस अनाज भंडारण के लिए मिटटी से पकाए बर्तन मिले हैं।
2. प्रीहिस्ट्री दौर - नदी घाटी सभ्यता (3500-2000 ईसा पूर्व)
- इस विकसित सभ्यता के अवशेष हडप्पा, धोलवीरा से लेकर दक्षिण में कीलाडी तक और अब खोजे जा रहे राखी गढ़ी स्थल में मिलते हैं।
- शहरों की तरह पानी संचय और निकासी की पद्धति विकसित हो चुकी थी।
- पानी की उपलब्धता और नदी घाटी की उर्वर ज़मीन से समाज कृषि सरप्लस की ओर बढ़ने लगा; अनाज की ढुलाई के लिए बैलगाड़ियों के प्रमाण मिले हैं।
- अन्न और जल भंडारण तथा ड्रेनेज सिस्टम इन शहरों की पहचान बन चुके थे।
- खुदाई में मिले गेम्स, डाइस व बाट उस दौर में होने वाले व्यापार को दर्शाते हैं।
- नृतकी की कांस मूर्ति दर्शाती है कि ढलाई के लिए 'लोस्ट वैक्स' (Lost Wax) प्रक्रिया का इस्तेमाल होने लगा था।
3. प्रोटोहिस्ट्री दौर - ब्रांज व लोहयुग (2,000 – 600 ईसा पूर्व)
- कौशांबी, गंगा घाटी और बस्तर इस युग के प्रतीक हैं।
- लोहे की भट्टी इस युग का महत्वपूर्ण आविष्कार है; लोहे की कुल्हाड़ी से जंगलों को साफ़ कर खेती के योग्य बनाया गया; खेती के उपकरण भी बनाए जाने लगे।
- कृषि उत्पादन के साथ जनसँख्या बढ़ी और सभ्यता का प्रसार हुआ; पूरा इलाका फ़ूड गैदरिंग चरण पार करके फ़ूड उत्पादन चरण में प्रवेश कर गया।
- प्राचीन तर्कशील/पदार्थवादी साहित्य की रचना: तमिल व्याकरण 'तोलपाक्कियम' में संसार को पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश से रचित बताया गया।
- वैदिक संस्कृत में रचित 'बौधायन शुलभसूत्र' (600 ईपू) में पाईथा गोरस थ्योरम जैसे कथन का वर्णन है जिसके आधार पर हवन कुंड बनाए जाते थे।
4. प्राचीन हिस्ट्री - कोडीफिकेशन युग (500 ईपू – 300 ई)
- युग के प्रतीक: बक्षाली, सारनाथ, तन्जूवर।
- ब्राह्मी और तामीझी लीपियाँ विकसित हुईं; ये लीपियाँ महाद्वीप में अनेक समकालीन लीपियों का आधार बनीं।
- एथिक्स, तर्क और सत्य की अवधारणाएं प्रस्तुत करने वाले बौद्ध और जैन धर्म स्थापित हुए तथा सांख्य, न्याय, वैशेषिक, योग और चार्वाक दर्शनों की रचना हुई।
- महाद्वीप की सबसे प्राचीन गणित पाण्डुलिपि 'बक्षाली' की रचना हुई जिसमें ज़ीरो (शून्य) का बिंदु के रूप में वैल्यू सिस्टम के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
- सुश्रुत संहिता में मेडिसिन और सर्जरी की व्याख्या की गई।
5. प्राचीन हिस्ट्री - गणित, खगोल व विश्वविद्यालयों का युग (300-700 ई)
- युग के प्रतीक: नालंदा, सांची, श्रिंगवर्पुर, भीनमाल।
- विश्वविद्यालयों में दर्शन, गणित, चिकित्सा, रसायन और खगोल जैसे सैकड़ों विषय पढाए जाते थे।
- आर्यभट्ट ने पाई (Pi) की सटीक वैल्यू बताई; ब्रह्मगुप्त ने चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल का सूत्र दिया।
- लोह मेटलर्जी में विकास हुआ; दिल्ली स्थित चंद्रगुप्त द्वतीय द्वारा निर्मित लोह स्तंभ, जिस पर आज तक जंग नहीं लगा है, को विशेष एलाय के तौर पर देखा जा सकता है। लीपियों का क्षेत्रीय विकास हुआ।
6. मध्ययुगीन हिस्ट्री - मंदिर वास्तुकला (700-1300 ई)
- युग के प्रतीक: मराघेह वेधशाला, मोधेरा गुजरात का सूर्य मंदिर, सोमपुरा और गाओचेंग।
- इरान में पूर्वी अजरबेजान में स्थित 'मराघेह वेधशाला' पूरे एशिया में विज्ञान और गणित का केंद्र बनी जिसके प्रभाव से उलूग बेग की वेधशाला स्थापित हुई जो भारत में 'जंतर मंतर' का आधार बनी।
- मोधेरा (गुजरात) का सूर्य मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है; यहाँ दोपहर के समय सूर्य सीधा सिर पर पड़ता है।
- बांग्लादेश के सोमपुरा में बौद्ध विश्वविद्यालय की वास्तुकला भी इसी प्रकार की है। स्थानीय भाषाओं और लीपियों का विकास हुआ।
7. मध्ययुगीन हिस्ट्री - सिंथेसिस और विकास युग (1300-1600 ई)
- युग के प्रतीक: केरल और आंध्र तट।
- खगोल शास्त्र की केरल स्कूल के नीलकंठ सोम्याजी की रचना 'तंत्रसंग्रह' प्लेनेटरी की हेलिओ-सेंट्रिक (Helio-centric) थ्योरी का आधार प्रस्तुत करती है; इसने अरब और यूरोपीय गणित और खगोल शास्त्र को प्रभावित किया।
- उच्च शिक्षा का जनवादीकरण: ज्येष्ठदेव की मलायम में 'युक्तिभाषा' गणित पुस्तक की रचना।
- पर्शियन रेहट (Persian Wheel) – पट्टे और गियर से बल की ट्रांसमिशन।
8. मध्ययुगीन हिस्ट्री - उत्तम वास्तुकला व हस्तशिल्प युग (1600-1750 ई)
- युग के प्रतीक: राजगढ़, आगरा, ढाका, जयपुर।
- जयपुर, उज्जैन और दिल्ली में जन्तर-मंतर का निर्माण।
- ताजमहल – पैमाइश में बारीकियां, शिल्प कौशल और एडवांस्ड जिओमेट्रिक डिज़ाइन का नमूना।
- शिवाजी किला – पत्थर वास्तुकला और प्राकृतिक लैंडस्केप के ब्लेंड का नमूना।
- ढाके की मलमल – प्रीमियम हैंडलूम।
9. आधुनिक हिस्ट्री - ब्रिटिश उपनिवेश युग (1750-1900 ई)
- युग के प्रतीक: मैसूर, मुंबई, कोलकटा, खड़गपुर।
- रेलवे इन्फ्रास्ट्रक्चर – आधुनिक मशीन मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार।
- सूती कपड़ो की मिलें।
- राकेट – टीपू सुलतान के काल में विकसित राकेट को अध्ययन के लिए लंदन ले जाया गया।
10. आधुनिक हिस्ट्री - आज़ादी की लड़ाई का युग (1900 – 1950)
- प्रफुल चन्द्र रे: मेधनाथ साहा और सत्येन्द्र नाथ बोस जैसे छात्रों को प्रोत्साहित कर विज्ञान और आज़ादी की लड़ाई के बीच समझ मज़बूत की; आत्म निर्भरता के प्रतीक के रूप में 'बंगाल केमिकल्स' की स्थापना की।
- सी वी रमन: स्वयं द्वारा बनाए गए उपकरणों से मॉलिक्यूल्स के प्रकाश से टकराने पर रंग बदलने को खोजा – जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।
- चरखा: ग्रामीण स्तर पर घरेलू औद्योगीकरण का प्रतीक।
11. आधुनिक हिस्ट्री – आज़ादी के बाद
- पंचवर्षीय योजनाओं में संपन्न बुनियादी काम – ऊर्जा, तेल, कोयला, बिजली, दूर संचार, उपकरण, खाद्य भंडारण, उर्वरक, बेसिक केमिकल्स।
- प्रमुख व्यक्तित्व: विक्रम साराभाई, सतीश धवन, होमी जे भाभा, के इ हमीद।
- हिस्ट्री लेखन (Science of History)।
केस स्टडी 1: जेनेटिक्स की समझ का इतिहास
ग्रीक युग में इनहेरिटेंस की समझ
यूनानी और आयुर्वेद युग - माइक्रोस्कोप, जेनेटिक और मोलिक्युलर बायोलॉजी के टूल्स उपलब्ध होने से पहले के युग थे। जानकारी का दायरा पदार्थ और इन्द्रियों के बीच सीधा संपर्क से प्राप्त ज्ञान तक सीमित था। इन सीमाओं के भीतर यूनानी दार्शनिकों द्वारा अनुवांशिक गुणों के ट्रांसमिशन की व्याख्या की गई: चिकित्सा का पिता कहे जाने वाले हिप्पोक्रेट्स (460-370 बी सी) के अनुसार अनुवांशिक गुण माँ-बाप के अंगों के सार के रूप में ट्रांसमिट होते हैं।
आयुर्वेद साहित्य में इन्हेरिटेंस का वर्णन
चरक और सुश्रुत की संहिताओं को आगे बढ़ाते वाले वाग्भट द्वारा 'अष्टांगहृद्यम' (छटी सदी एडी) के शरीरस्थानम में इन्हेरिटेंस का वर्णन किया गया है:
- शुक्र और अंडे के शुद्ध होने पर कर्मों के अनुसार क्लेश से प्रेरित मन सामर्थ्य के अधीन उसी प्रकार गर्भ बन जाता है जैसे दो लकड़ियों की रगड़ से अग्नि बनती है।
- शुक्र-अंडे का निर्माण सूक्ष्म महाभूत, सत्व और आत्मा के अनुगम से होता है और गर्भ की वृद्धि माता के रसजन्य भूतों से होती है।
- जिस प्रकार सूर्य की किरणों का तेज सूर्य-कांतमणि के बीच से ईंधन में जाता हुआ दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार गर्भाशय में सत्व का प्रवेश भी दिखाई नहीं देता।
- शुक्र की अधिकता से पुरुष, अंडे की अधिकता से स्त्री और दोनों के समान होने पर नपुंसक पैदा होता है।
ग्रेगर मेंडल (20 जुलाई 1822 - 6 जनवरी 1884)
- ऑस्ट्रियन साम्राज्य स्थित सिल्लेसिया में जन्मे मेंडेल ने बचपन में माली के रूप में काम किया; पढ़ाई की फ़ीस देने का समर्थ नहीं था और भिक्षु बन गए; उनका मानना था: "संघर्षशील किसान के बेटे के रूप में भिक्षु जीवन ने मुझे जीने के साधन की निरंतर चिंता से मुक्त कर दिया।"
- ओलोमौक विश्वविद्यालय और वियना विश्विद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।
- चर्च में दो हेक्टर के बगीचे में मटर के आपस में स्वतंत्र सात गुणों का अध्ययन किया - बीज का आकार, फूलों का रंग, फली की रंगत, फली का आकार, कच्ची फली का रंग, फूलों की लोकेशन और पौधे की उंचाई।
- 1856 से 1863 के बीच 28,000 पौधे टेस्ट करने पर पाया कि: जब किसी एक गुण की विभिन्न वैरायटियों, जैसे लंबे और छोटे पौधों, को आपस में क्रोस किया तो पहली पीढ़ी में पौधे केवल डोमिनेंट (Dominant) गुणों वाले होते हैं लेकिन दूसरी पीढ़ी में रिसेसिव (Recessive) गुण भी वापसी करने लगते हैं।
- आगे चलकर एरिक वॉन त्शेरमाक (1871-1962) ने फसलों की गुण-आधारित शुद्ध लाइनें विकसित कीं और गेहूं, जौ और जई की अधिक पैदावार देने वाली रोग-प्रतिरोधी नई किस्में तैयार कीं।
नॉर्मन बोरलॉग (शांति के क्षेत्र में नोबेल पुरूस्कार 1970)
- 25 मार्च 1914 को अमेरिका के क्रेस्को में जन्मे बोरलॉग ने प्लांट प्रोटेक्शन में पीएचडी की और 1940 और 1950 के दशक में मेक्सिको में काम करते हुए खेती करने के बेहतर तरीके सुझाए।
- गेहूँ की पुरानी किस्में लंबी हुआ करती थीं और ज़्यादा खाद के इस्तेमाल से बालियाँ भारी होने पर पौधे हवा या बारिश में गिरने लगते थे।
- जापान की 'नोरिन-10' किस्म के गुण का इस्तेमाल करते हुए पौधों की लंबाई घटाई ताकि वे भारी बालियों का बोझ सह पाएं।
- नई किस्म में खाद और पानी के इस्तेमाल से पौधे की लंबाई की बजाय अनाज की पैदावार बढ़ने लगी।
- बौनी किस्म के इस्तेमाल से 1956 तक मेक्सिको खाद्यान्न की पैदावार में आत्मनिर्भर बन गया।
- भारत और पकिस्तान जैसे देशों में खाद्य उत्पादन जनसँख्या में हो रही वृद्धि के अनुरूप नहीं बढ़ पा रहा था। 1960 के दशक में भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में खाद्यान उत्पादन बढ़ा और अकाल के खतरे टल गए।
- माना जाता है कि उनके द्वारा सुझाई तकनीकों के इस्तेमाल से दुनिया भर में लगभग एक अरब से अधिक लोगों की जानें बचीं।
- उन्हें "दुनिया को खाना खिलाने वाला इंसान" कहा जाता है और उन्हें 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 12 सितम्बर 2009 को डलास में उनकी मृत्यु हुई।
केस स्टडी 2: जेनेटिक्स की समझ का इतिहास - रसायन विज्ञान
परिचय
- सांख्य दर्शन में महर्षि कपिल ने सृष्टि की उत्पति के लिए 'पंचमहाभूत' का हाइपोथिसिस प्रस्तुत किया।
- पंचमहाभूत के तत्व: पदार्थ के तीन रूप ठोस (पृथ्वी), तरल (जल) और गैस (वायु) रूप, ऊर्जा (अग्नि) और स्पेस (आकाश)।
- कहा गया कि पंचमहाभूत से निर्मित निर्जीव (जड़) पदार्थों में जब आत्मा जुडती है तो जीव पैदा होता है। सृष्टि और जीव की रचना का सरल वर्णन करने वाले इस हाइपोथिसिस का इस्तेमाल आयुर्वेद में भी किया गया।
- वैज्ञानिक तकनीकों में होते गए विकास से धीरे-धीरे हम सृष्टि का निर्माण करने वाले सभी 118 तत्व और उनसे बने मॉलिक्यूल्स से परिचित होते चले गए।
- शुरू में माना जाता था कि आर्गेनिक कंपाउंड्स का निर्माण केवल जीवों में पाई जाने वाली जीवन-शक्ति से होता है और यह शक्ति केवल जीवों में ही होती है।
- जर्मन केमिस्ट फ्रीड्रिख वोह्लर ने 1828 में लैब में आर्गेनिक कंपाउंड 'यूरिया' का निर्माण करके यह धारणा पूरी तरह से बदल दी।
मॉलिक्यूलर बायोलॉजी - बायोमॉलिक्यूल्स के रूप में जीव की समझ
आर्गेनिक केमिस्ट्री की बेहतर समझ से शरीर और इसके सेल्स के निर्माण और फिजियोलॉजी में प्रोटीन्स और न्यूक्लिक एसिड्स की भूमिका सामने आने लगी। यह भी पता चला कि पौधे फोटोसिंथेसिस से ऊर्जा को कैद करके प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स और फ़ैट्स जैसे पोलीमर्स के रूप स्टोर करते हैं और जब इन पोलीमर्स से निर्मित भोजन का सेवन किया जाता है तो सबसे पहले एंजाइम्स से इन्हें फिर से सूक्ष्म मोनोमर में परिवर्तित करते हैं जिस रूप में गट वाल को पार कर खून के माध्यम से सभी सेल्स में पहुँचते हैं, जहां फिर से प्रोटीन्स और न्यूक्लिक एसिड्स जैसे मोलिकूल्स बनते हैं।
प्रमुख रसायनशास्त्री (केमिस्ट)
- जर्मन-स्वीडिश फार्मास्युटिकल केमिस्ट कार्ल विल्हेम शीले (9 दिसंबर 1742 – 21 मई 1786)
- ब्रिटिश केमिस्ट हम्फरी डेवी (1778 –1829)
- फ्रेंच वैज्ञानिक गे-लुसैक (1778 –1850)
- स्वीडिश केमिस्ट जॉन्स जैकब बर्ज़ीलियस (1771 – 1848)
सिंथेटिक आर्गेनिक केमिस्ट्री का युग
- जर्मन केमिस्ट फ्रेडरिक वोहलर (1800 – 1882) ने 1828 में इनआर्गेनिक कंपाउंड्स अमोनियम क्लोराइड और सिल्वर साइनेट को गर्म करके पहली बार आर्गेनिक कंपाउंड 'यूरिया' को लैब में बनाया।
- प्राणियों के शरीर में यूरिक एसिड की स्ट्रक्चर के जैसे, ज़ैंथिन, हाइपोज़ैंथिन, एडेनिन और गुआनिन पाए जाते थे जिनमे से पहले तीन को मासपेशियों के पदार्थों के रूप में खोजा जा चूका था; फिजियोलॉजिकल केमिस्ट्री में हुए विकास से पता चला कि ये चारों सेल न्यूक्लियस के अहम घटक हैं।
- प्राणी जगत के ये पदार्थ वनस्पति जगत के तीन पदार्थों से भी जुड़ते हैं - चाय और कॉफी में पाए जाने वाली कैफीन तथा कोको में पाए जाने वाली थियोब्रोमीन। कोको और थियोब्रोमीन दिल के लिए और पेशाब उतारने के लिए दवाओं के रूप में इन्हें चाय और कोको से फैक्ट्री लेवल पर तैयार किया जाता था।
- लैब में यूरिया के निर्माण के बाद सिंथेटिक आर्गेनिक केमिस्ट्री के युग की शुरुआत हुई और ओगनिक कंपाउंड्स की प्राप्ति के लिए हाइड्रोकार्बन्स, वुडटार, कोलटार और वुड अल्कोहल जैसे प्रकृतिक स्रोतों पर निर्भरता घटने लगी।
- सिंथेटिक केमिस्ट्री के उत्पाद: सिंथेटिक डाई, डीएज़ो कंपाउंड्स, ट्राईफिनाइलमीथेन डाईस्टफ, बिस्मार्क ब्राउन, क्राइसोडीन, कांगो रेड।
- जर्मन केमिस्ट एडॉल्फ वॉन बेयर को सिंथेटिक नील (Indigo) तैयार करने के लिए 1905 में केमिस्ट्री में नोबेल पुरूस्कार से सम्मानित भी किया गया।
मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के रचनाकार
- हर्मन एमिल फिशर (1852 –1919): मॉलिक्यूल्स की स्टीरियोकेमिकल कॉन्फ़िगरेशन से 50 प्रकार की शुगर्स का चित्रण और नामकरण किया; 150 प्रकार के प्यूरीन पदार्थ और उनके बीच सम्बन्ध खोजे।
- जर्मन बायोकेमिस्ट अल्ब्रेक्ट कोसेल (1853 – 1927): मेटाबोलिज्म की विभिन्न स्थितियों में ज़रूरी पोषण की प्रकार और मात्रा तथा शरीर से निष्कासित होने वाले एंड प्रोडक्ट्स का अध्ययन किया जिससे इन्टेक और आउटपुट से इकॉनमी और प्रबंधन के आंतरिक फैक्टर्स की तस्वीर का पता चलता है; बताया कि प्रोटीन्स एमिनो एसिड्स के पोलीमर्स हैं। इसके बाद डीएनए (DNA) की समझ विकसित हुई।
निष्कर्ष: ‘नीधम’ ग्रैंड क्वेश्चन का उत्तर
जग मिथ्या ब्रह्म सत्य एप्रोच: भारतीय चिंतन परंपरा की तरह यूरोपीय चिंतन परम्परा में भी वैज्ञानिक पक्ष आदर्शवाद के आवरण में ढके रहे थे लेकिन रेनेसां (पुनर्जागरण) दौर में इन आवरण से मुक्ति की शुरुआत हो गई थी। यह काम वहां विज्ञान और वैज्ञानिक विधि में निरंतर प्रगति का आधार भी बने।
लेकिन भारतीय चिंतन परंपरा को 'वेदान्त' के आवरण से मुक्त करने का काम आज भी अधूरा है। इसके लिए विज्ञान का जनवादीकरण अत्यंत आवश्यक है।